एक दिन मैं बैठी थी पनघट पर
तब मेरी उदास आँखें आयीं भर
आँखों से आँसू बहने लगे झटझट
याद करके वह दिन जिसका गवाह है पनघट
वह सब मेरे बचपन के दिनों की याद
नाना के संग यहाँ आती थी दोपहर के बाद
मेरी झूमती पायल की आहट सुनकर
लहरें बहती मधुर गीत गुनगुनाकर
जब साथ लाती मैं अपनी सारी सहेलियाँ
तब लहरों से गूँजती प्यारी प्यारी पहेलियाँ
एक एक बिछड़ने लगी मुझसे धीरे धीरे
तब तन्हा होकर बैठती इस नदिया के तीरे
कल मैं भी जाऊँगी छोड़कर इस पनघट का साथ
जो मुझे मिला हर सूना दिन और हर तन्हा रात
कल यहाँ आएँगी फ़िरसे कोई राधा या बेला
फ़िरसे छोड़ जाएँगी इस पनघट को अकेला
Tuesday, March 6, 2007
Monday, February 26, 2007
छोटी खुशियाँ
इससे बढ़िया और क्या हो सकता है.........
बरसता सावन हो और हाथ में हो गरम चाय का प्याला
कडी़ धूप में चलते हों और ‘लिफ़्ट’ दे कोई पहचानवाला
कडा़के की ठंड़ में एन. आर. आई. चाचा सौगात में दें एक गरम ऊनी कोट
ठीक फ़िल्म जाने के पहले नानी हाथ में थमा दे बीस रुपये की नोट
बगलवाली सीट पर आकर बैठे़ वही जो दिल में समाया हो
किसी दोस्त की बहुत याद आती हो और उसी दिन उसका खत आया हो
कभी मन उदास हो और दराज़ में से वर्ड्सवर्थ की डैफ़ोडिल्स मिले
ऐसा लगे जैसे बादलों के बीच से इन्द्रधनुष निकले
शतरंज खेलते खेलते बढ़िया चाल दिख जाए
डरते डरते नन्हा निकू सायकल सीख जाए
वैलेन्टाइन्स डे पर वह स्वीकार करे तुम्हारा लाल गुलाब
इंतिहान में सही आये हों लगभग सारे जवाब
परदेस में बैठे हों और याद आये देस की मिट्टी
आँखें भर आयें हँसते हँसते पढ़कर माँ की चिट्ठी
इन छोटी खुशियों को भुलाकर हम छोटे गम याद करते हैं
हर पल में आनंद जो होता है, क्यों उसे बरबाद करते हैं?
क्यों न हम हर पल को अपना बना दे?
ज़िन्दगी यह छोटी सी है, आओ इसको सजा दे.
बरसता सावन हो और हाथ में हो गरम चाय का प्याला
कडी़ धूप में चलते हों और ‘लिफ़्ट’ दे कोई पहचानवाला
कडा़के की ठंड़ में एन. आर. आई. चाचा सौगात में दें एक गरम ऊनी कोट
ठीक फ़िल्म जाने के पहले नानी हाथ में थमा दे बीस रुपये की नोट
बगलवाली सीट पर आकर बैठे़ वही जो दिल में समाया हो
किसी दोस्त की बहुत याद आती हो और उसी दिन उसका खत आया हो
कभी मन उदास हो और दराज़ में से वर्ड्सवर्थ की डैफ़ोडिल्स मिले
ऐसा लगे जैसे बादलों के बीच से इन्द्रधनुष निकले
शतरंज खेलते खेलते बढ़िया चाल दिख जाए
डरते डरते नन्हा निकू सायकल सीख जाए
वैलेन्टाइन्स डे पर वह स्वीकार करे तुम्हारा लाल गुलाब
इंतिहान में सही आये हों लगभग सारे जवाब
परदेस में बैठे हों और याद आये देस की मिट्टी
आँखें भर आयें हँसते हँसते पढ़कर माँ की चिट्ठी
इन छोटी खुशियों को भुलाकर हम छोटे गम याद करते हैं
हर पल में आनंद जो होता है, क्यों उसे बरबाद करते हैं?
क्यों न हम हर पल को अपना बना दे?
ज़िन्दगी यह छोटी सी है, आओ इसको सजा दे.
Thursday, February 22, 2007
अनोखा सफ़र
(इस रचना को मैंने १९९८ मॆं मेरी अमरनाथ यात्रा के तुरंत बाद रचा था, यात्रा के अनोखे़ सफ़र पर यह रचना आधारीत है )
बर्फ़िली चट्टाने हैं, झर झर बहते झरने हैं
नये रास्ते हैं, फ़िर भी यह सभी क्यों लगते अपने हैं
’जय शिव शंकर’ की गुंज सुनाई पड़ती है,
कई बार साँस फ़ुलती है, फ़िर भी आस बढ़ती है
रुकते रुकते, थमते थमते सभी चढ़ते हैं
दिल में अरमान लेकर आगे बढ़ते हैं
ज़रूर पुरे होते हैं सभी के दर्शन के अरमान
क्योंकि सहकार, सुरक्षा देते हैं बी. एस.एफ़. के जवान
पत्थरों,चट्टानों पर से बहता है ठंडा़ पानी
किसी चंचल मृग समान होती है उसकी रवानी
मिलते हैं कई नये लोग, नये चेहरे, नयी मुस्कान
साथ चलते चलते मुश्किल राह बन जाती आसान
’होश होश’ करके घोडे़वाले आगे चलते हैं लेकर घोडों की कतार
सभी सफ़र करते हैं पैदल, डोली में या घोडों पर सवार
इन ’होश होश’ करने वालों की,पिट्ठुओं की ज़िन्दगी भी
इसी राह की तरह मुश्किल होती है.......
सवारिओं का बोझ उठाकर ही तो
इनको मिलती रोटी है
मंज़िल तक पहुँचते हैं ठंडे़ पानी में करके स्नान
तभी महसूस होता है जिस्म से दूर हूई थकान
पौडियों पर चढ़कर सभी यात्री बर्फ़िले अमरनाथ शिवलिंग के दर्शन पाते हैं
दिल में अलौकिक दर्शन की याद और आँखों में बुँदें लेकर लौट जाते हैं
उन्हीं बर्फ़िली वादियों से,नदियों से,चट्टानों से बिछडकर हम लौट आते हैं
उसी शहरों की दुनियामें जहाँ हम हम नहीं केवल यंत्र होते हैं
फ़िर भी यह सफ़र जीवन में कुछ बहाव लाता है
और साथ ही यादों का एक सुनहरा पडा़व लाता है
बर्फ़िली चट्टाने हैं, झर झर बहते झरने हैं
नये रास्ते हैं, फ़िर भी यह सभी क्यों लगते अपने हैं
’जय शिव शंकर’ की गुंज सुनाई पड़ती है,
कई बार साँस फ़ुलती है, फ़िर भी आस बढ़ती है
रुकते रुकते, थमते थमते सभी चढ़ते हैं
दिल में अरमान लेकर आगे बढ़ते हैं
ज़रूर पुरे होते हैं सभी के दर्शन के अरमान
क्योंकि सहकार, सुरक्षा देते हैं बी. एस.एफ़. के जवान
पत्थरों,चट्टानों पर से बहता है ठंडा़ पानी
किसी चंचल मृग समान होती है उसकी रवानी
मिलते हैं कई नये लोग, नये चेहरे, नयी मुस्कान
साथ चलते चलते मुश्किल राह बन जाती आसान
’होश होश’ करके घोडे़वाले आगे चलते हैं लेकर घोडों की कतार
सभी सफ़र करते हैं पैदल, डोली में या घोडों पर सवार
इन ’होश होश’ करने वालों की,पिट्ठुओं की ज़िन्दगी भी
इसी राह की तरह मुश्किल होती है.......
सवारिओं का बोझ उठाकर ही तो
इनको मिलती रोटी है
मंज़िल तक पहुँचते हैं ठंडे़ पानी में करके स्नान
तभी महसूस होता है जिस्म से दूर हूई थकान
पौडियों पर चढ़कर सभी यात्री बर्फ़िले अमरनाथ शिवलिंग के दर्शन पाते हैं
दिल में अलौकिक दर्शन की याद और आँखों में बुँदें लेकर लौट जाते हैं
उन्हीं बर्फ़िली वादियों से,नदियों से,चट्टानों से बिछडकर हम लौट आते हैं
उसी शहरों की दुनियामें जहाँ हम हम नहीं केवल यंत्र होते हैं
फ़िर भी यह सफ़र जीवन में कुछ बहाव लाता है
और साथ ही यादों का एक सुनहरा पडा़व लाता है
Friday, February 16, 2007
कुछ हो रहा है
जब किसी जुही की कली की तरह मन महकने लगे
जब अरमानों के अंबर पर नन्हे पंछी की तरह मन चहकने लगे
जब आँखें मूंदकर यूंही किसी राह पर मन बहकने लगे.........
संभल जाना, कुछ हो रहा है
जब अंबर को सजा दें चाँद और तारे
जब हवा महक जाए नदि किनारे
जब प्यारे लगने लगे यह सारे नज़ारे........
संभल जाना कुछ हो रहा है
जब होठों पर सजती रहे हल्की सी मुस्कान
जब दिल में गुनगुनाने लगे अजीब से अरमान
जब हर आरज़ू महसूस हो खुद से अनजान........
संभल जाना कु्छ हो रहा है
जब बस यूं ही अरमान बन जाए छोटी सी आरज़ू
जब कोई अपने संग लाए नशीली खुशबू
जब खुशी ही खुशी नज़र आए हरसू........
ना संभालो, कुछ हो रहा है होने दो
मेरे सपनों को उनके आँगन में बोने दो
जब अरमानों के अंबर पर नन्हे पंछी की तरह मन चहकने लगे
जब आँखें मूंदकर यूंही किसी राह पर मन बहकने लगे.........
संभल जाना, कुछ हो रहा है
जब अंबर को सजा दें चाँद और तारे
जब हवा महक जाए नदि किनारे
जब प्यारे लगने लगे यह सारे नज़ारे........
संभल जाना कुछ हो रहा है
जब होठों पर सजती रहे हल्की सी मुस्कान
जब दिल में गुनगुनाने लगे अजीब से अरमान
जब हर आरज़ू महसूस हो खुद से अनजान........
संभल जाना कु्छ हो रहा है
जब बस यूं ही अरमान बन जाए छोटी सी आरज़ू
जब कोई अपने संग लाए नशीली खुशबू
जब खुशी ही खुशी नज़र आए हरसू........
ना संभालो, कुछ हो रहा है होने दो
मेरे सपनों को उनके आँगन में बोने दो
Saturday, February 10, 2007
यादें
वक्त बदल जाता है,बदलते बदलते दे जात है यादें......सिर्फ़ यादें
यादें........
किसी आम की, किसी खास की
किसी मकाम की, किसी अह्सास की
आवाज़ और नज़र के दायरे से दूर
सब बेहे जात है करके हमें मजबूर
और रेहे जाति हैं यादे सिर्फ़ यादें
यादें ......
किसी डगर की, किसी सफ़र की
किसी शेहेर, पेड और मकान की
किसी जहां की, किसी आसमान की
बारीश, सर्दियां और बहार की
किसी दर्द की, किसी प्यार की
किसी नज़र की, किसी मुस्कान की
किसी अन्जान की, और...........
किसी अपना सा लगनेवाले इन्सान की
बस जाते हैं ये सब
दिल में अहसास बनकर
होठों पर मुस्कान बनकर सजते हैं
और आंखों से बूंदें बनकर बरस्ते हैं
समय बेहे जाता है और छोड जात है यादें .....सिर्फ़ यादें
यादें........
किसी आम की, किसी खास की
किसी मकाम की, किसी अह्सास की
आवाज़ और नज़र के दायरे से दूर
सब बेहे जात है करके हमें मजबूर
और रेहे जाति हैं यादे सिर्फ़ यादें
यादें ......
किसी डगर की, किसी सफ़र की
किसी शेहेर, पेड और मकान की
किसी जहां की, किसी आसमान की
बारीश, सर्दियां और बहार की
किसी दर्द की, किसी प्यार की
किसी नज़र की, किसी मुस्कान की
किसी अन्जान की, और...........
किसी अपना सा लगनेवाले इन्सान की
बस जाते हैं ये सब
दिल में अहसास बनकर
होठों पर मुस्कान बनकर सजते हैं
और आंखों से बूंदें बनकर बरस्ते हैं
समय बेहे जाता है और छोड जात है यादें .....सिर्फ़ यादें
Thursday, February 8, 2007
Indian Spring
When I crush the tender ice below my feet ......as I walk in downtown Toronto
I think of the Indian Spring.....the cuckoo's song, the smell of Jasmine
The wind chill reminds me of the warmth I willingly left behind
The warmth of my language, loved ones and my past pulled into tomorrow
I walk bundled up in my jacket and reach the intersection of Queen and Bay
I think of the Gulmohar- lined streets in my town blushed into crimson red
Of how the cuckoo's notes woke me every summer from my bed
The dawn splendidly attired by the gifts of May.
I walk along the frozen lake and think of Godavari's banks
I think of the long evenings I with my firends when I get on subway
I can't help but smile upon the laughter that rose out of pranks
A few things left behind and so many to catch on my way
These memoris of the Indian Spring lead me into a cold cold winter.........
And give me the dreams that I may realise as I crush the ice so tender.
I think of the Indian Spring.....the cuckoo's song, the smell of Jasmine
The wind chill reminds me of the warmth I willingly left behind
The warmth of my language, loved ones and my past pulled into tomorrow
I walk bundled up in my jacket and reach the intersection of Queen and Bay
I think of the Gulmohar- lined streets in my town blushed into crimson red
Of how the cuckoo's notes woke me every summer from my bed
The dawn splendidly attired by the gifts of May.
I walk along the frozen lake and think of Godavari's banks
I think of the long evenings I with my firends when I get on subway
I can't help but smile upon the laughter that rose out of pranks
A few things left behind and so many to catch on my way
These memoris of the Indian Spring lead me into a cold cold winter.........
And give me the dreams that I may realise as I crush the ice so tender.
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