Friday, February 16, 2007

कुछ हो रहा है

जब किसी जुही की कली की तरह मन महकने लगे
जब अरमानों के अंबर पर नन्हे पंछी की तरह मन चहकने लगे
जब आँखें मूंदकर यूंही किसी राह पर मन बहकने लगे.........
संभल जाना, कुछ हो रहा है

जब अंबर को सजा दें चाँद और तारे
जब हवा महक जाए नदि किनारे
जब प्यारे लगने लगे यह सारे नज़ारे........
संभल जाना कुछ हो रहा है

जब होठों पर सजती रहे हल्की सी मुस्कान
जब दिल में गुनगुनाने लगे अजीब से अरमान
जब हर आरज़ू महसूस हो खुद से अनजान........
संभल जाना कु्छ हो रहा है

जब बस यूं ही अरमान बन जाए छोटी सी आरज़ू
जब कोई अपने संग लाए नशीली खुशबू
जब खुशी ही खुशी नज़र आए हरसू........

ना संभालो, कुछ हो रहा है होने दो
मेरे सपनों को उनके आँगन में बोने दो

6 comments:

Divine India said...

बिल्कुल आपकी कृति स्पष्टत: संकेत कर रही है की क्या हो रहा है…बहुत सुंदर्…पर अंतिम लाईन देने की आवश्यकता नहीं थी थोड़ा अलग दिख रहा है…

monika said...
This comment has been removed by the author.
manya said...

bahut pyaare bhaaw hain .. masoomiyat se bhare huye.. saaf kahte hain ki kahan ka ho raha hai.."जो रंग बदले फ़िज़ाओं ने, महकी हवायें और हम खो गये बेखुदी में तो जाना कुछ हो गय है"

उडन तश्तरी said...

वाह, बढ़िया है. स्वागत है हिन्दी ब्लाग जगत में. निरंतर लिखें, शुभकामना.

Ash said...

Sonal Ji,
Aap aise hi likhte rehana, aapki kavitaen or vichar pardkhe mera din bahut aacha nikalta hai.

aapki agli kavita ki apeksha mein hame inteezar hai

Ash

priyankar said...

'आपके सपने औए उनका आंगन' वाह! क्या भाव हैं .ऐसा समर्पण प्रेम में ही सम्भव है.