जब किसी जुही की कली की तरह मन महकने लगे
जब अरमानों के अंबर पर नन्हे पंछी की तरह मन चहकने लगे
जब आँखें मूंदकर यूंही किसी राह पर मन बहकने लगे.........
संभल जाना, कुछ हो रहा है
जब अंबर को सजा दें चाँद और तारे
जब हवा महक जाए नदि किनारे
जब प्यारे लगने लगे यह सारे नज़ारे........
संभल जाना कुछ हो रहा है
जब होठों पर सजती रहे हल्की सी मुस्कान
जब दिल में गुनगुनाने लगे अजीब से अरमान
जब हर आरज़ू महसूस हो खुद से अनजान........
संभल जाना कु्छ हो रहा है
जब बस यूं ही अरमान बन जाए छोटी सी आरज़ू
जब कोई अपने संग लाए नशीली खुशबू
जब खुशी ही खुशी नज़र आए हरसू........
ना संभालो, कुछ हो रहा है होने दो
मेरे सपनों को उनके आँगन में बोने दो
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6 comments:
बिल्कुल आपकी कृति स्पष्टत: संकेत कर रही है की क्या हो रहा है…बहुत सुंदर्…पर अंतिम लाईन देने की आवश्यकता नहीं थी थोड़ा अलग दिख रहा है…
bahut pyaare bhaaw hain .. masoomiyat se bhare huye.. saaf kahte hain ki kahan ka ho raha hai.."जो रंग बदले फ़िज़ाओं ने, महकी हवायें और हम खो गये बेखुदी में तो जाना कुछ हो गय है"
वाह, बढ़िया है. स्वागत है हिन्दी ब्लाग जगत में. निरंतर लिखें, शुभकामना.
Sonal Ji,
Aap aise hi likhte rehana, aapki kavitaen or vichar pardkhe mera din bahut aacha nikalta hai.
aapki agli kavita ki apeksha mein hame inteezar hai
Ash
'आपके सपने औए उनका आंगन' वाह! क्या भाव हैं .ऐसा समर्पण प्रेम में ही सम्भव है.
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