(इस रचना को मैंने १९९८ मॆं मेरी अमरनाथ यात्रा के तुरंत बाद रचा था, यात्रा के अनोखे़ सफ़र पर यह रचना आधारीत है )
बर्फ़िली चट्टाने हैं, झर झर बहते झरने हैं
नये रास्ते हैं, फ़िर भी यह सभी क्यों लगते अपने हैं
’जय शिव शंकर’ की गुंज सुनाई पड़ती है,
कई बार साँस फ़ुलती है, फ़िर भी आस बढ़ती है
रुकते रुकते, थमते थमते सभी चढ़ते हैं
दिल में अरमान लेकर आगे बढ़ते हैं
ज़रूर पुरे होते हैं सभी के दर्शन के अरमान
क्योंकि सहकार, सुरक्षा देते हैं बी. एस.एफ़. के जवान
पत्थरों,चट्टानों पर से बहता है ठंडा़ पानी
किसी चंचल मृग समान होती है उसकी रवानी
मिलते हैं कई नये लोग, नये चेहरे, नयी मुस्कान
साथ चलते चलते मुश्किल राह बन जाती आसान
’होश होश’ करके घोडे़वाले आगे चलते हैं लेकर घोडों की कतार
सभी सफ़र करते हैं पैदल, डोली में या घोडों पर सवार
इन ’होश होश’ करने वालों की,पिट्ठुओं की ज़िन्दगी भी
इसी राह की तरह मुश्किल होती है.......
सवारिओं का बोझ उठाकर ही तो
इनको मिलती रोटी है
मंज़िल तक पहुँचते हैं ठंडे़ पानी में करके स्नान
तभी महसूस होता है जिस्म से दूर हूई थकान
पौडियों पर चढ़कर सभी यात्री बर्फ़िले अमरनाथ शिवलिंग के दर्शन पाते हैं
दिल में अलौकिक दर्शन की याद और आँखों में बुँदें लेकर लौट जाते हैं
उन्हीं बर्फ़िली वादियों से,नदियों से,चट्टानों से बिछडकर हम लौट आते हैं
उसी शहरों की दुनियामें जहाँ हम हम नहीं केवल यंत्र होते हैं
फ़िर भी यह सफ़र जीवन में कुछ बहाव लाता है
और साथ ही यादों का एक सुनहरा पडा़व लाता है
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7 comments:
Sonal Ji,
Wah Wah, kya baat hai.
Bada accha laga aapki kavita padh ke. Hamara desh yaad aa gaye.
Aapke agli kavita ki prateeksha mein,
Ash
वाह, बहुत खुब. अच्छा लिखा है, लिखते रहो. बहुत बढिया चित्रण है. लेखनी जारी रखना, शुभकामना.
यात्रा का दृश्य घूम गया आंखों के आगे। अमरनाथ तो नहीं गया लेकिन पहाड़ों पर तीर्थस्थानों पर जाते हुए ऐसे ही अनुभव होते हैं।
सोनल जी,
बहुत अच्छा लिखा है ..बधाई
ऎसे ही लिखती रहें ।
अमरनाथ जाने का कभी मौक़ा तो नहीं मिला पर सुना है कठिन सफ़र है। मगर एक बार पहुँच कर जो शांति मिलती है, उसकी कोई तुलना नहीं। इसे एक लेख बन कर लिखो, अब जितना याद है। तस्वीरें हो तो उन्हें भी डालो।
Very good Sonal,
Keep it up.
My best wishes with you always.
Sheetal
ये पंक्ति विशेष रूप से अच्छी लगी।
उसी शहरों की दुनियामें जहाँ हम हम नहीं केवल यंत्र होते हैं
इस कविता ने मेरी भी अमरनाथ यात्रा की स्मृति ताजा कर दी। उन दिनों सुरक्षा की कोई समस्या नहीं थी, अत: बड़ी उन्मुक्तता और स्वतंत्रता से यह यात्रा की थी। लिखने का प्रयास करूंगा कभी!
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