एक दिन मैं बैठी थी पनघट पर
तब मेरी उदास आँखें आयीं भर
आँखों से आँसू बहने लगे झटझट
याद करके वह दिन जिसका गवाह है पनघट
वह सब मेरे बचपन के दिनों की याद
नाना के संग यहाँ आती थी दोपहर के बाद
मेरी झूमती पायल की आहट सुनकर
लहरें बहती मधुर गीत गुनगुनाकर
जब साथ लाती मैं अपनी सारी सहेलियाँ
तब लहरों से गूँजती प्यारी प्यारी पहेलियाँ
एक एक बिछड़ने लगी मुझसे धीरे धीरे
तब तन्हा होकर बैठती इस नदिया के तीरे
कल मैं भी जाऊँगी छोड़कर इस पनघट का साथ
जो मुझे मिला हर सूना दिन और हर तन्हा रात
कल यहाँ आएँगी फ़िरसे कोई राधा या बेला
फ़िरसे छोड़ जाएँगी इस पनघट को अकेला
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4 comments:
Sonal Ji,
Aap ne bahut hi sunder kavita likhi...avashya hi aap videsh mein desh ka panghat miss karti hongi... likhte rahiye, hum padhte rahenge or comment dete raheinge.
Sonal Ji,
Bahut aachi poem aapne likhi hai. Dil bahut khush aur ati prashanit hua.
Bahut pyari lekh likhi hai.
Aapki aagli kavita ki pratiksha mein,
Ash
बहुत सुंदर और प्रेरणा संपन्न कविता बखुबी से सारे तथ्यों को समेटा है भावनाओं के बिखरे कौतूहल से…। बधाई!!
Sonal you write what each and everyone feels. God has gifted you with this art of expressing feelings so nicely.
Keep writing.Best wishes always.Luv, Sheetu
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