एक दिन मैं बैठी थी पनघट पर
तब मेरी उदास आँखें आयीं भर
आँखों से आँसू बहने लगे झटझट
याद करके वह दिन जिसका गवाह है पनघट
वह सब मेरे बचपन के दिनों की याद
नाना के संग यहाँ आती थी दोपहर के बाद
मेरी झूमती पायल की आहट सुनकर
लहरें बहती मधुर गीत गुनगुनाकर
जब साथ लाती मैं अपनी सारी सहेलियाँ
तब लहरों से गूँजती प्यारी प्यारी पहेलियाँ
एक एक बिछड़ने लगी मुझसे धीरे धीरे
तब तन्हा होकर बैठती इस नदिया के तीरे
कल मैं भी जाऊँगी छोड़कर इस पनघट का साथ
जो मुझे मिला हर सूना दिन और हर तन्हा रात
कल यहाँ आएँगी फ़िरसे कोई राधा या बेला
फ़िरसे छोड़ जाएँगी इस पनघट को अकेला
Tuesday, March 6, 2007
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