पनघट

एक दिन मैं बैठी थी पनघट परतब मेरी उदास आँखें आयीं भरआँखों से आँसू बहने लगे झटझटयाद करके वह दिन जिसका गवाह है पनघट वह सब मेरे बचपन के दिनों की यादनाना के संग यहाँ आती थी दोपहर के बादमेरी झूमती पायल की आहट…

छोटी खुशियाँ

इससे बढ़िया और क्या हो सकता है……… बरसता सावन हो और हाथ में हो गरम चाय का प्यालाकडी़ धूप में चलते हों और ‘लिफ़्ट’ दे कोई पहचानवाला कडा़के की ठंड़ में एन. आर. आई. चाचा सौगात में दें एक गरम ऊनी कोटठीक फ़िल्म जाने…

अनोखा सफ़र

(इस रचना को मैंने १९९८ मॆं मेरी अमरनाथ यात्रा के तुरंत बाद रचा था, यात्रा के अनोखे़ सफ़र पर यह रचना आधारीत है ) बर्फ़िली चट्टाने हैं, झर झर बहते झरने हैंनये रास्ते हैं, फ़िर भी यह सभी क्यों लगते अपने हैं’जय शिव शंकर’…

कुछ हो रहा है

जब किसी जुही की कली की तरह मन महकने लगेजब अरमानों के अंबर पर नन्हे पंछी की तरह मन चहकने लगेजब आँखें मूंदकर यूंही किसी राह पर मन बहकने लगे………संभल जाना, कुछ हो रहा है जब अंबर को सजा दें चाँद और तारेजब हवा…

यादें

वक्त बदल जाता है,बदलते बदलते दे जात है यादें……सिर्फ़ यादेंयादें……..किसी आम की, किसी खास कीकिसी मकाम की, किसी अह्सास की आवाज़ और नज़र के दायरे से दूरसब बेहे जात है करके हमें मजबूरऔर रेहे जाति हैं यादे सिर्फ़ यादें यादें ……किसी डगर की, किसी…